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27 अक्टूबर 2026 ·

प्रकृति और हमारी जिम्मेदारी

प्रकृति और हमारी जिम्मेदारी

प्रकृति में सब कुछ बदलता दिखाई देता है। ऋतुएँ आती जाती हैं, जीवन जन्म लेता है और रूप बदलते हैं। नौवें भाग की व्याख्या इस परिवर्तन को ईश्वर और प्रकृति के आध्यात्मिक संबंध से देखती है। यहाँ प्रस्तुत विचार धार्मिक दर्शन की भाषा में हैं। उनका व्यावहारिक प्रश्न है कि विशाल व्यवस्था के बीच मनुष्य अपने कर्म और जिम्मेदारी को कैसे समझे।

प्रकृति को देखने की आध्यात्मिक दृष्टि

श्रीमद्भगवद्गीता के इस नवें भाग के श्लोक संख्या दस में भगवान् सत्यव्रत, अर्जुन को आगे कह रहे हैं कि हे अर्जुन! ये सम्पूर्ण सृष्टि मेरी अधिष्ठान शक्ति द्वारा उत्पन्न होती है, और मैं ही इसका अध्यक्ष यानी नियन्ता, साक्षी और प्रेरक हूँ। यहाँ इस श्लोक में वह बता रहे हैं कि यद्यपि प्रकृति कार्य करती है, परंतु प्रेरणा, नियम और चेतना; सब भगवान् के अधीन हैं।

वह कहते हैं कि हे अर्जुन! यह सम्पूर्ण सृष्टि मेरी अध्यक्षता में कार्य करती है। प्रकृति केवल साधन है, पर मैं इसका निर्देशक हूँ। मेरी उपस्थिति और इच्छा से ही यह चराचर जगत् निरंतर परिवर्तनशील होकर चलता है। पिछले श्लोक में उन्होंने बताया कि यद्यपि वे सृष्टि, पालन और संहार करते हैं, फिर भी उन कर्मों से बंधते नहीं हैं, क्योंकि वे असक्त हैं। अब इस श्लोक में वे बता रहे हैं कि प्रकृति सृष्टि का कार्य करती है, पर मैं उसका अधीक्षक हूँ। सृष्टि मेरी आज्ञा और नियमों के अनुसार चलती रहती है।

‘मयाध्यक्षेण प्रकृतिः’ अर्थात् ईश्वर की अध्यक्षता में प्रकृति कार्य करती है। वह बता रहे हैं कि हे कौन्तेय! प्रकृति यानी उनकी माया स्वतंत्र नहीं है; वह मेरी देखरेख में कार्य करती है। यहाँ ‘अध्यक्ष’ शब्द का अर्थ है; साक्षी, प्रेरक, नियन्ता और नियंत्रक। जैसे कोई संचालक संपूर्ण तंत्र को दिशा देता है, वैसे ही ईश्वर सृष्टि के समस्त नियमों और प्रवृत्तियों को संचालित करते हैं।

परिवर्तन और आधार का संबंध

‘सूयते सचराचरम्’ अर्थात् ये चर और अचर सब प्रकृति से उत्पन्न हैं। प्रकृति से ही पाँच महाभूत, मन, बुद्धि और अहंकार प्रकट होते हैं; इन्हीं से यह सारा चराचर जगत् बनता है। चर यानी चलने वाले मानव जैसे कर्मयोगी, पशु, पक्षी आदि हैं, और अचर, जैसे स्थिर पदार्थ ये पर्वत, वृक्ष, पृथ्वी आदि हैं। परंतु प्रकृति केवल उपकरण है; वास्तविक सृजन शक्ति ईश्वर की है, जो इन्हें चलाता है। मैंने जब इस सृष्टि की रचना की, तब मैंने प्रकृति को माध्यम बनाया। प्रकृति ही वह मूल तत्त्व है जिससे पाँच महाभूत; पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश उत्पन्न हुए। इन्हीं पाँच तत्वों से सारा संसार बना है; शरीर, वस्तुएँ, पर्वत, सागर, वनस्पति, पशु, पक्षी और मानव; सब इसी के अंश हैं। प्रकृति केवल भौतिक नहीं, बल्कि मानसिक और सूक्ष्म स्तर पर भी कार्य करती है। इसी से मन, बुद्धि और अहंकार प्रकट होते हैं। मन भावनाओं और विचारों का केंद्र है, बुद्धि निर्णय लेने की शक्ति है, और अहंकार वह भ्रम है जो मैं और मेरा का भाव पैदा करता है। इन्हीं से मिलकर यह चराचर यानी चलने-फिरने वाला और स्थिर; जगत् बना है। इस प्रकार प्रकृति सृष्टि की भौतिक और मानसिक संरचना है, जिसके बिना ब्रह्मांड का अस्तित्व अधूरा है।

पुस्तक की व्याख्या में सृष्टि में जो कुछ भी है, वह दो भागों में विभाजित है; चर और अचर। चर अर्थात् चलने-फिरने वाले, जीवित मानव; जैसे मानव, पशु, पक्षी, जलचर, कीट आदि। इन सबमें जीवन और चेतना का प्रवाह है। इन सबके भीतर मन, बुद्धि और इच्छा शक्ति होती है, जो उन्हें क्रियाशील बनाती है। दूसरी ओर अचर अर्थात् स्थिर, अचल वस्तुएँ जैसे पर्वत, वृक्ष, नदियाँ, सागर, आकाश और पृथ्वी। ये भले ही निर्जीव दिखते हैं, पर इनमें भी ईश्वर की चेतना विद्यमान है। इनके बिना जीवन संभव नहीं, क्योंकि यही सब चर मानवों का आधार हैं। इस प्रकार यह चर-अचर जगत् एक-दूसरे से जुड़ा है, जैसे शरीर में हड्डियाँ और रक्त साथ मिलकर शरीर को पूर्ण बनाते हैं। सृष्टि में कुछ भी स्वतंत्र नहीं है; मेरी प्रकृति-शक्ति ने हर तत्त्व को एक-दूसरे के पूरक के रूप में रचा है। यद्यपि सृष्टि का भौतिक आधार प्रकृति है, परंतु वास्तविक सृजन शक्ति ईश्वर हैं। प्रकृति स्वयं कुछ नहीं कर सकती, वह केवल एक उपकरण है जिसके माध्यम से मैं यह कार्य करता हूँ। इसी कारण मैंने कहा है ‘मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्।’ अर्थात् मेरे आदेश से ही प्रकृति यह चर-अचर जगत् उत्पन्न करती है।

नियमों के बीच सजग कर्म

यह तुम्हें मैं बता रहा हूँ कि प्रकृति कार्य करने वाली है, पर इच्छा करने वाली नहीं है। इच्छा और उद्देश्य ईश्वर का ही है, केवल कर्म का माध्यम प्रकृति है। जैसे कोई कुम्हार मिट्टी से घड़ा बनाता है; मिट्टी साधन है, पर सृजन की शक्ति कुम्हार में ही है। मिट्टी अपने आप घड़ा नहीं बना सकती; उसे आकार देने वाले हाथ कुम्हार के ही होते हैं। उसी तरह, यह सृष्टि भी मेरी प्रेरणा से ही चल रही है। प्रकृति केवल रूप, रंग और तत्त्व देती है, पर उसमें प्राण, गति और चेतना ईश्वर भरते हैं। मैं इस सृष्टि का कर्त्ता, धारक और नियंता हूँ; मैंने जैसा बताया। मैं हर वस्तु, हर मानव और हर घटना के मूल में हूँ। प्रकृति मेरी माया है, जो विभिन्न रूपों में बदलती रहती है, पर उसके पीछे जो अपरिवर्तनशील शक्ति है, वही ईश्वर हैं। वे हर जगह हैं; हवा की तरह, प्रकाश की तरह, पर किसी एक वस्तु या रूप में बंधें नहीं हैं। मैं इस सृष्टि को चलाता हूँ, पर स्वयं उससे परे हूँ। मानव, पशु, वृक्ष, पर्वत; सब मेरी शक्ति के माध्यम हैं, पर मेरी सत्ता इन सबसे ऊँची और स्वतंत्र है। यही कारण है कि सृष्टि की हर गति, हर परिवर्तन, और हर संतुलन का नियंत्रण मेरे हाथ में है।

‘हेतुनानेन जगद् विपरिवर्तते’ अर्थात् यही जगत्-परिवर्तन का कारण भी है। ‘विपरिवर्तते’ अर्थात् जगत् निरंतर परिवर्तनशील है; उत्पत्ति, स्थिति और लय इसका स्वभाव है। इस परिवर्तन का कारण यही है कि मेरी अध्यक्षता में प्रकृति सतत् कार्यरत रहती है। यह सृष्टि एक दैवी प्रयोगशाला की तरह है, जहाँ हर वस्तु, हर घटना ईश्वर के नियमों के अधीन घटित होती रहती है। ‘मयाध्यक्षेण’ अर्थात् ईश्वर सर्वनियंता हैं। वे प्रकृति के भीतर कार्य नहीं करते, बल्कि उसकी प्रेरणा और दिशा निर्धारित करते हैं। प्रकृति तीन गुणों; सत्त्व, रजस और तमस; से युक्त है। और मेरे द्वारा यह सृष्टि रची जाती है। परंतु इन गुणों के ऊपर जो शक्ति है, वह ही मेरा यानी परमेश्वर का आदेश है। प्रकृति केवल एक उपादान कारण है यानी भौतिक कारण है। और भगवान्-ईश्वर यानी मैं निमित्त कारण हूँ अर्थात् प्रेरक कारण हूँ। अर्थ यही है कि सृष्टि का पदार्थ प्रकृति से आता है, परंतु उसकी चेतना, गति और नियम मुझ से आते हैं। प्रकृति भगवान् की इच्छा के बिना कार्य नहीं कर सकती।

कर्मयोगी के लिए यह श्लोक भगवान् की सर्वशक्तिमान सत्ता का परिचय है। जो यह जान लेता है कि हर कार्य, हर गति, हर नियम भगवान् के अधीन है; वह कभी अहंकार नहीं करता। उसे ज्ञात रहता है कि मैं कुछ नहीं कर रहा; भगवान् ही सब करा रहे हैं। इससे उसका मन सहज रूप से समर्पित और शुद्ध हो जाता है। समझना केवल ये है कि भगवान् सृष्टि के अध्यक्ष हैं; प्रकृति उनकी अधीन शक्ति है। सृष्टि, पालन और लय का संचालन ईश्वर की प्रेरणा से होता है। यह संसार निरंतर ईश्वर की इच्छा से परिवर्तनशील है। मानव और पदार्थ दोनों उस दिव्य शक्ति के अधीन हैं। प्रकृति स्वतंत्र नहीं; वह ईश्वर की इच्छा से कार्य करती है। सृष्टि का निरंतर परिवर्तन श्रीकृष्ण जी की उसी दैवी नियम का परिणाम है। जो इसे समझ लेता है, वह संसार के परिवर्तन से अप्रभावित रहता है। संसार की हर गति, हर परिवर्तन और हर घटना ईश्वर की अध्यक्षता में होती है। इसलिए कर्म करते हुए भी मन में यह भाव रखना चाहिए कि मैं नहीं, भगवान् ही सब करा रहे हैं। इससे अहंकार मिटता है, और मन में श्रद्धा, शांति और समर्पण आता है।

परिवर्तन को देखकर जिम्मेदारी समझें

इस चिंतन को दैनिक जीवन में लाते समय दो बातें साथ रखी जा सकती हैं। पहली, संसार की पूरी व्यवस्था हमारी इच्छा से नहीं चलती। दूसरी, हमारे हिस्से के कर्म फिर भी महत्वपूर्ण हैं। मौसम, दूसरे लोगों के निर्णय और अनेक बाहरी परिस्थितियाँ हमारे नियंत्रण से बाहर हैं। लेकिन तैयारी, सावधानी और जिम्मेदार व्यवहार हमारी ओर से संभव हैं।

किसी योजना में बदलाव आए तो पहले वास्तविक स्थिति देखें। क्या बदल गया है, क्या बचा है और अब उचित कदम क्या है? परिवर्तन को स्वीकार करने का अर्थ प्रयास छोड़ना नहीं है। स्वीकार करने से हम वास्तविक परिस्थिति के अनुसार काम कर पाते हैं। इसी प्रकार प्रकृति को पूजनीय मानना उसकी उपेक्षा की छूट नहीं देता। जल को व्यर्थ बहने से रोकना, आसपास स्वच्छता रखना और संसाधनों का सोचकर उपयोग करना श्रद्धा के छोटे और सार्थक व्यावहारिक रूप बन सकते हैं।

अध्याय का आध्यात्मिक संदेश मानव को व्यापक व्यवस्था के प्रति विनम्र बनाता है। हम जीवन के स्वामी होने का दावा कम करें और उसके सहभागी होने की जिम्मेदारी अधिक समझें। जब यह दृष्टि विकसित होती है, तब बदलती परिस्थितियों में भी अपने आचरण का आधार बनाए रखना संभव लगता है। प्रश्न केवल यह नहीं रह जाता कि दुनिया मेरे लिए क्या कर रही है। प्रश्न यह भी बनता है कि मैं इस दुनिया में अपने हिस्से का काम कितनी समझ, कितनी संवेदना और कितनी निष्ठा से कर रहा हूँ।

संदर्भ: श्रीमद्भगवद्गीता — रहस्यमय ज्ञान
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