5 नवंबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार
स्मरण की जड़

जो भीतर से सहारा देता है
कोई बात ठीक समय पर स्मरण आ जाती है तो हम प्रसन्न होते हैं। किसी कठिन विचार का अर्थ खुलता है तो लगता है कि समझ का एक नया द्वार मिल गया। ऐसे अनुभवों में अपने प्रयत्न का स्थान है, लेकिन क्या हम उस समझने की क्षमता को भी अपने ही बनाए हुए साधन की तरह देखते हैं? श्रीमद्भगवद्गीता के भाग पंद्रह का पंद्रहवाँ श्लोक मुझे इस प्रश्न पर रोकता है। भगवान् सबके हृदय में स्थित होने का कथन करते हैं और स्मृति, ज्ञान तथा विस्मरण को अपने अधिष्ठान से जोड़ते हैं। यहाँ अपने भीतर चल रही शक्ति को कृतज्ञ दृष्टि से देखने का निमंत्रण है।
हृदय में स्थित होने का भाव केवल किसी बाहरी स्थान की खोज नहीं है। यहाँ अंतःकरण की ओर दृष्टि जाती है। जो मन समझता है, जो बुद्धि विवेक करती है और जो अनुभव स्मरण में आते हैं, उनके पीछे भी परम आधार का स्मरण रखा गया है। इससे ईश्वर का संबंध जीवन के दूरस्थ अवसरों तक सीमित नहीं रहता। अध्ययन करते हुए, काम का अर्थ समझते हुए और अपनी सीमाओं को देखते हुए भी उस संबंध पर विचार किया जा सकता है। भीतर की क्षमता का सम्मान उसे मनमाने ढंग से अपना अधिकार मान लेने से अलग है। वह प्राप्त सामर्थ्य के प्रति जागरूक होना है।
इस दृष्टि में मनुष्य का प्रयत्न छोटा नहीं होता। जिसने पढ़ा है, अभ्यास किया है और प्रश्न पर समय दिया है, उसके श्रम का मूल्य बना रहता है। पर श्रम करने की क्षमता और श्रम के फल को धारण करने की समर्थता भी जीवन की बड़ी व्यवस्था से अलग नहीं समझी जाती। मैं इस भाव को प्रयत्न और कृतज्ञता के मेल के रूप में देखता हूँ। केवल अपना श्रम देखूँ तो अभिमान का अवसर है। केवल कृपा की बात कहकर श्रम छोड़ दूँ तो अपनी जिम्मेदारी से दूरी होगी। श्लोक की व्याख्या इन दोनों को साथ लेकर आगे बढ़ने का आग्रह करती है।
ज्ञान के साथ अपने भीतर यह प्रश्न बना रहे कि मैं उसका उपयोग कैसे कर रहा हूँ। जो समझ मिली है, वह मुझे अधिक सावधान बना रही है या केवल अपनी श्रेष्ठता का दावा दे रही है? जो स्मरण है, वह विषय खोलने में सहायक है या दूसरों को छोटा करने में लगाया जा रहा है? ये प्रश्न किसी और की विद्वत्ता नापने से पहले अपनी ओर रखे जा सकते हैं। भीतर के अधिष्ठान को याद रखने का अर्थ केवल एक धार्मिक वाक्य दुहराना नहीं। वह अपनी क्षमता से ऐसा संबंध बनाना है जिसमें जिम्मेदारी भी हो और उसका मूल भूल जाने की कठोरता भी न हो।
स्मृति और ज्ञान एक ही बात नहीं
स्मृति अनुभवों और सीखी बातों को धारण करती है। ज्ञान उनके अर्थ को समझने की ओर ले जाता है। पुस्तक की कई पंक्तियाँ याद हो सकती हैं, लेकिन वे किस प्रश्न का उत्तर देती हैं और जीवन में उनके संकेत कहाँ तक हैं, यह अलग विचार माँगता है। इसीलिए स्मरण को तुच्छ मानना भी ठीक नहीं और उसे समझ की पूरी जगह दे देना भी ठीक नहीं। स्मृति आधार देती है, पर उस आधार पर विचार का काम भी करना है। मेरी दृष्टि में अध्ययन का सौंदर्य तब बढ़ता है जब याद रखा हुआ शब्द अर्थ से मिलता है और अर्थ व्यवहार की कसौटी तक पहुँचता है।
कल्पना कीजिए कि कोई विद्यार्थी एक सूत्र सुना देता है, पर उसके प्रयोग की स्थिति अभी नहीं समझता। दूसरा विद्यार्थी शब्दों में अटकता है, लेकिन प्रश्न को समझने की कोशिश कर रहा है। इन दोनों को तुरंत अंतिम श्रेणियों में बाँट देना सीखने को सरल करके देखना होगा। दोनों के सामने अलग काम है। पहले को अर्थ और दूसरे को स्पष्ट अभिव्यक्ति पर समय देना पड़ सकता है। यह अध्ययन का कल्पित उदाहरण है, श्लोक का कोई अलग वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं। इससे मैं इतना समझता हूँ कि किसी एक प्रदर्शन को देखकर ज्ञान की पूरी गहराई का दावा कर देना उचित सावधानी नहीं होगी।
जब स्मृति को ही अपनी पहचान बना लेते हैं, तब कोई बात भूल जाना भीतर बहुत बड़ा आघात लग सकता है। जब समझ की यात्रा को भी पहचानते हैं, तो भूल सामने आने पर प्रश्न बदल सकता है। क्या मैंने अर्थ समझा था? कौन सा संबंध अभी स्पष्ट नहीं है? किस अंश को दोबारा पढ़ना है? ऐसे प्रश्न अपने प्रयत्न को जगह देते हैं। यहाँ भूलने का कारण तय करने या हर भूल को समान कहने की बात नहीं। अपने अध्ययन में जहाँ सुधार संभव हो, उसे देखने का आग्रह है। अपनी सीमा को देखकर केवल अपमान अनुभव करने के बजाय अगला सीखने योग्य कदम पहचानना अधिक उपयोगी हो सकता है।
स्मृति के प्रति कृतज्ञता का एक रूप उसका सही उपयोग भी है। जो बात सुरक्षित रखी है, उसे बिना संदर्भ के किसी पर लागू कर देना ज्ञान नहीं बन जाता। मूल अर्थ, प्रसंग और अपनी समझ की सीमा साथ रहनी चाहिए। शास्त्र के शब्दों में रुचि अच्छी है, लेकिन शब्दों के सहारे अपने लिए अचूक होने का अधिकार बना लेना अलग प्रवृत्ति है। अंतःकरण में विनम्रता रहे तो पढ़ा हुआ प्रश्नों को बंद नहीं करेगा, उन्हें ठीक दिशा में खोल सकेगा। इस तरह स्मरण केवल संग्रह नहीं रहता; वह विवेकपूर्ण विचार का सहयोगी बन सकता है।
विस्मरण के बीच जिम्मेदारी
श्लोक स्मृति और ज्ञान के साथ अपोहन का भी उल्लेख करता है। व्याख्या उसे विस्मरण से जोड़ती है और जीवन को केवल अपनी इच्छा से चलता हुआ मानने की सीमा दिखाती है। हम चाहें तो हर सीखी बात हर समय समान स्पष्टता से उपस्थित रहे, लेकिन अनुभव ऐसा नहीं होता। यह स्वीकार हमें अपने बारे में अतिशयोक्ति से रोक सकता है। साथ ही इससे किसी विशेष व्यक्ति की भूल का आध्यात्मिक कारण तय नहीं किया जा सकता। यहाँ मेरा विषय अपनी मानसिक प्रक्रियाओं पर पूर्ण स्वामित्व के दावे को नम्र करना है, किसी की कठिनाई पर निर्णय सुनाना नहीं।
कभी बीती बात का भार अपने वर्तमान काम से बड़ा हो जाता है। व्याख्या विस्मरण के संदर्भ में जीवन के आगे बढ़ने की संभावना पर भी विचार करती है। मैं इससे हर स्मृति मिटाने का कोई नियम नहीं निकालता। आवश्यक अनुभव से सीखना और उसकी बात को निरंतर अपने विरुद्ध दुहराते रहना अलग अवस्थाएँ हैं। जो समझ अगली जिम्मेदारी में सहायता दे, उसे साथ रखना है। जो अपनी पहचान को केवल पिछली कमी में बंद कर दे, उसके बारे में सजग होना है। यह भेद भीतर की यात्रा का विषय है, किसी निश्चित मानसिक परिणाम का वादा नहीं।
ईश्वर के अधिष्ठान को मानकर अपनी तैयारी छोड़ देना इस विवेचन का अर्थ नहीं है। पुस्तक का आग्रह स्पष्ट है कि पढ़ना, अभ्यास करना, चिंतन करना और कर्तव्य निभाना बना रहे। कृपा का स्मरण कर्म का विकल्प नहीं बनता। यदि कोई विषय अभी समझ नहीं आया, तो उसके लिए दिया जाने वाला समय भी हमारी जिम्मेदारी है। प्रार्थना में विवेक माँगना और उस विवेक के लिए पढ़ी हुई बात को ध्यान से देखना साथ चल सकते हैं। यह संबंध भक्त को अपने प्रयास से दूर नहीं करता, बल्कि उसे परिणाम के दावे में कठोर हुए बिना प्रयत्न करने की दिशा देता है।
अपने ज्ञान पर अभिमान और अपनी भूल पर निराशा, दोनों में मन केवल अपने को ही केंद्र बना सकता है। एक में कहता है कि मैं ही सब जानता हूँ, दूसरे में कि मेरे लिए आगे कोई रास्ता नहीं। श्लोक का अधिष्ठान इन दोनों दावों को देखने की जगह देता है। मेरी समझ उपयोगी है, लेकिन अंतिम नहीं। मेरी सीमा वास्तविक हो सकती है, लेकिन उसे देखकर अगला प्रयास भी संभव है। कृतज्ञता का यह संतुलन अपने प्रति ईमानदारी रखता है। वह उपलब्धि को झुठलाता नहीं और कमी को छिपाता भी नहीं; दोनों के साथ विनम्रता से कर्म करने का आधार खोजता है।
अध्ययन को दिया हुआ समय
युवा पाठक के लिए इस भाव का एक निकट अर्थ है। जानकारी मिल जाना और विषय अपना हो जाना अलग बातें हैं। किसी बात को पढ़कर तुरंत आगे बढ़ते जाने में संग्रह बढ़ सकता है, पर जहाँ अर्थ अटक रहा हो वहाँ रुकना भी अध्ययन है। अपने प्रश्न को ठीक से पहचानना, संबंधित अंश फिर पढ़ना और अभ्यास का काम पूरा करना, इन सामान्य प्रयत्नों में समय लगता है। वही समय धीरे धीरे सीख को उपयोगी आधार दे सकता है। कृपा में भरोसा रखने वाला विद्यार्थी इस श्रम से बचता नहीं। वह प्राप्त अवसर का सम्मान करके उसे सार्थक काम में लगाता है।
मान लीजिए दो साथी किसी विषय की तैयारी कर रहे हैं। एक को बहुत सी बातें याद हैं, दूसरे को उनमें से एक संबंध स्पष्ट हो गया है। यदि दोनों अपने अपने हिस्से को श्रेष्ठता का प्रमाण बनाएँ, तो साझा काम पीछे रह जाएगा। यदि वे एक दूसरे की सहायता स्वीकार करें, तो स्मरण और समझ साथ काम कर सकते हैं। यह एक कल्पित स्थिति है, पर कृतज्ञता का व्यवहारिक अर्थ इसमें दिखाई देता है। सहायता ग्रहण करने वाला मन दूसरे की उपस्थिति को बाधा नहीं समझता। अपने समय को तुलना की अंतहीन बहस में खोने के बजाय वह विषय की तैयारी को आगे रख सकता है।
काम सीखते हुए भी यही प्रश्न रहता है कि अपना ज्ञान स्थिर संपत्ति समझ रहे हैं या उसे और स्पष्ट करने की जिम्मेदारी ले रहे हैं। कोई कौशल आ गया तो उसके भीतर सावधानी की आवश्यकता समाप्त नहीं होती। सीखी हुई प्रक्रिया का अर्थ समझना, बदलती जरूरत को देखना और जहाँ संदेह हो वहाँ पूछना भी काम का सम्मान है। युवा जीवन में समय की रक्षा केवल घड़ी की निगरानी से नहीं होती। जिस समझ को श्रम से पाया है, उसे सचमुच काम में लाना भी समय का आदर है। कृतज्ञता उस श्रम और उसके अवसर को हल्के में नहीं लेने देती।
इस तैयारी में विश्राम का अपना स्थान बना रहना चाहिए। सार्थक जीवन का अर्थ यह नहीं कि हर क्षण कोई बाहरी उपलब्धि दिखाई दे। यहाँ आग्रह मन को निरंतर दबाव में रखने का नहीं, उपलब्ध समय के प्रति सजग होने का है। जब सीखने का समय है तो उसमें मन की उपस्थिति हो; जब आवश्यक विश्राम है तो उसे दोष समझने की जिद न हो। श्लोक से निकला मेरा विचार अवसर और क्षमता के प्रति जिम्मेदारी का है। युवा मन अपने ज्ञान को प्रदर्शन का बोझ बनाने के बजाय सीख, काम और ईमानदार चिंतन का आधार बना सके, इतना उद्देश्य पर्याप्त गहरा है।
शब्द से सार की ओर
श्लोक का दूसरा पक्ष अध्ययन के अंतिम लक्ष्य को सामने रखता है। भगवान् कहते हैं कि सभी वेदों से जानने योग्य वे ही हैं और वेदान्त के कर्ता तथा वेदों के ज्ञाता भी वही हैं। इस विवेचन में शब्दों का आदर बना रहता है, पर शब्द अंतिम पड़ाव नहीं बनते। शास्त्र का उद्देश्य परम सत्य की पहचान की ओर ले जाना है। यदि अध्ययन केवल अपने संग्रह की बड़ी सूची बनाता रहे और भीतर विनम्रता का स्थान न बने, तो लक्ष्य पर फिर विचार करना होगा। पुस्तक पढ़ने की संख्या और उसके अर्थ से बदलती दृष्टि को एक ही बात नहीं मानना चाहिए।
मुझे इस कथन में ज्ञान का अपमान नहीं, उसे अपने उद्देश्य की ओर वापस लाना दिखाई देता है। शब्द आवश्यक हैं, लेकिन वे किस ओर संकेत कर रहे हैं, यह देखना भी आवश्यक है। जैसे प्रश्न की भाषा समझे बिना उत्तर याद कर लेना अधूरा होगा, वैसे ही शास्त्र के संकेत को छोड़े हुए केवल उसकी पंक्तियाँ अपने पास रखना भी अधूरा अध्ययन बन सकता है। अर्थ की खोज में समय देना इसीलिए महत्वपूर्ण है। वहाँ मन जल्दी निष्कर्ष पाने की इच्छा से थोड़ा हटता है और जो पढ़ रहा है, उसके साथ ईमानदारी से ठहरना सीखता है।
कृतज्ञ विद्यार्थी अपने प्रश्न को छिपाने के लिए बड़े शब्द नहीं जुटाता। जहाँ समझ कम है, वहाँ उसे स्वीकार कर सकता है। जहाँ कुछ स्पष्ट हुआ है, वहाँ उसे आगे के विचार का आधार बना सकता है। इसी तरह भक्त भी अपने स्मरण को ईश्वर के प्रति संबंध में रखकर उसे अधिकार की दीवार बनने से बचाता है। मैं कितना जानता हूँ, इसके साथ यह प्रश्न जुड़ता है कि जो जानता हूँ, उससे मेरे भीतर क्या जागा है। क्या दूसरों के प्रति सम्मान बढ़ा? क्या अपनी बात को परखने का धैर्य आया? क्या समय और प्राप्त सामर्थ्य का उपयोग अधिक जिम्मेदारी से हुआ?
स्मरण की जड़ में कृतज्ञता हो तो ज्ञान केवल मेरी उपलब्धि कहकर बंद नहीं हो जाता। वह प्राप्त सामर्थ्य का सजग उपयोग बनता है। प्रयास चलता है, पर भीतर अपना मूल भूल जाने की अकड़ नहीं पलती। भूल दिखाई देती है, पर उससे सीखने का स्थान भी बना रहता है। और अध्ययन आगे बढ़ता है तो उसका लक्ष्य केवल अधिक शब्द रखना नहीं, अधिक सच्ची समझ की ओर जाना रहता है। मैं इसी संतुलन को इस श्लोक का निकट उपहार मानता हूँ। जो प्रकाश भीतर काम कर रहा है, उसका सम्मान अपने अभ्यास, अपने विनय और अपने अगले कर्म में किया जा सकता है।