भारतीय ज्ञान परंपरा को सरल और प्रामाणिक रूप में समझाने का एक प्रयास...

5 नवंबर 2026 ·

किसी को छोटा किए बिना

किसी को छोटा किए बिना

जो सामने नहीं है, उसका भी मान

किसी मनुष्य का सम्मान उसके सामने की गई बातों से ही नहीं पहचाना जाता। वह कमरे से चला जाए, तब उसके विषय में हमारी भाषा कैसी होती है, यह भी अपने चरित्र को खोलता है। श्रीमद्भगवद्गीता के सोलहवें भाग में अपैशुनम् का विचार मुझे इसी जगह रोकता है। दैवी गुणों के बीच चुगली से मुक्त रहने की बात बहुत साधारण दिखाई दे सकती है। पर यह साधारणता ही उसे रोज के जीवन के पास लाती है। हमारे संवाद में किसी अनुपस्थित व्यक्ति के लिए कितनी न्यायपूर्ण जगह बची रहती है, इस प्रश्न को टालना आसान नहीं होना चाहिए।

अपैशुनम् को मैंने केवल होंठ बंद रखने का नियम नहीं माना है। उसमें दूसरे की अनुपस्थिति में उसके दोष फैलाने, बढ़ा-चढ़ाकर कहने और उसकी प्रतिष्ठा घटने में आनंद लेने की प्रवृत्ति से दूरी है। इस प्रवृत्ति के भीतर अपने मन का प्रश्न भी छिपा होता है। मुझे यह बात कहने की इच्छा क्यों हो रही है? क्या कोई आवश्यक सुधार सामने है, या मैं किसी को छोटा दिखाकर अपनी जगह ऊँची करना चाहता हूँ? जब बात के साथ उसका उद्देश्य देखा जाता है, तब शब्दों का पूरा भार दिखाई देने लगता है। यह अपने भीतर की ईमानदारी का काम है।

पुस्तक में इस गुण का संबंध विश्वास से रखा गया है। जो व्यक्ति एक के पास दूसरे की कमी और दूसरे के पास तीसरे की कमी लेकर जाता है, उसके आसपास संबंधों में सावधानी बढ़ने लगती है। सुनने वाले भी सोच सकते हैं कि मेरे जाने के बाद मेरे बारे में क्या कहा जाएगा। इस तरह बातचीत का आनंद अपने साथ असुरक्षा भी ला सकता है। मैं यहाँ किसी परिवार या समूह के बारे में कोई निश्चित घटना नहीं बता रहा। मैं उस प्रवृत्ति पर विचार कर रहा हूँ जिसमें शब्दों का उपयोग जोड़ने के स्थान पर लोगों के बीच दूरी बनाने में होने लगता है।

किसी की एक भूल को उसका पूरा परिचय बना देना इसी दूरी का एक रूप है। हमने एक काम अधूरा देखा, एक वाक्य सुना या एक अप्रिय व्यवहार अनुभव किया। उसके बाद यदि हर बातचीत में उसी से व्यक्ति का मूल्य तय करें, तो उसके लिए बदलने की जगह कहाँ बचेगी? भूल का महत्व अपने स्थान पर है। उसके कारण किसी उचित जिम्मेदारी को हटाना भी आवश्यक नहीं। पर व्यक्ति और उसके एक आचरण के बीच अंतर देखना समझ को अधिक न्यायपूर्ण बना सकता है। अनुपस्थित व्यक्ति अपने पक्ष की बात उसी क्षण नहीं रख सकता; इसलिए हमारी जिम्मेदारी और बढ़ती है।

सुधार की बात किसके पास जाए

अपैशुनम् का अर्थ आवश्यक बात को दबा देना नहीं है। मेरे पुस्तक-पाठ में यह भेद स्पष्ट है कि किसी गलती को सुधारना हो तो उचित व्यक्ति और उचित स्थान पर बात कहना जरूरी हो सकता है। बात फैलाने और समाधान की दिशा में रखने के उद्देश्य अलग हैं। इसलिए चुगली से बचने का विचार उत्तरदायित्व से भागने का माध्यम नहीं बनना चाहिए। यदि कोई काम प्रभावित हो रहा है, तो उसके तथ्य समझकर संबंधित व्यक्ति से बात की जा सकती है। उसमें विषय का केंद्र सुधार रहे; किसी को सार्वजनिक रूप से नीचा दिखाने का सुख केंद्र न बने।

इस अंतर को देखने के लिए मैं अपने कथन से कुछ प्रश्न पूछ सकता हूँ। जिसे बता रहा हूँ, क्या वह इस बात में सहायता कर सकता है? जो मैं जोड़ रहा हूँ, वह जाना हुआ तथ्य है या मेरी व्याख्या? क्या बात को उतना ही रखा जा सकता है जितना आवश्यक है? इन प्रश्नों को कोई कठोर सूची बनाकर दूसरे पर लागू करने से पहले अपने लिए देखना उपयोगी लगता है। वे हमें अपनी भाषा की दिशा पहचानने देते हैं। कभी मौन उचित होगा, कभी स्पष्ट संवाद और कभी संबंधित जिम्मेदारी तक बात पहुँचाना। उद्देश्य को समझे बिना केवल बोलने या न बोलने से निर्णय पूरा नहीं होता।

यदि किसी की कमी का वर्णन करते समय हमारी भाषा लगातार अधिक रोचक और अधिक कठोर होती जाती है, तो वहाँ ठहरने की जरूरत है। क्या विषय को समझने में नई स्पष्टता आई, या हमने केवल उसके चारों ओर अधिक रंग भर दिए? चुगली का आकर्षण कभी इसी रंग में छिपता है। सुनने वाले का ध्यान बनाए रखने के लिए विवरण बदलने लगता है। जिस व्यक्ति का जीवन सामने है, वह हमारी बातचीत का साधन बन जाता है। दैवी गुण का अभ्यास मुझे इस साधन बनाने वाली दृष्टि से बाहर आने का आग्रह देता है। दूसरे का मान उसके अनुपस्थित होने से समाप्त नहीं होता।

सुनने वाले की भी अपनी भूमिका है। किसी अधूरी बात में तुरंत अपनी ओर से निष्कर्ष जोड़ देना आवश्यक नहीं। हम विषय का आधार पूछ सकते हैं, अनिश्चित हिस्से को अनिश्चित रख सकते हैं और जहाँ संभव हो सीधे संवाद की ओर बात लौटा सकते हैं। इसमें अपने को दूसरों से श्रेष्ठ घोषित करने की जरूरत नहीं है। हमारी भूमिका केवल बातचीत की दिशा को थोड़ा जिम्मेदार बनाना हो सकती है। जिस व्यक्ति को अपनी भाषा पर काम करना है, वह मैं भी हूँ। इसी स्वीकार के साथ कोई शांत प्रश्न निंदा की गति को रोकने का छोटा अवसर बन सकता है।

दृढ़ता में कोमलता

इसी श्लोक में मार्दव का गुण भी आता है। मैंने उसे नम्रता, संवेदनशीलता और व्यवहार की कोमलता के रूप में समझाया है। उसके साथ सत्य और दृढ़ता बने रह सकते हैं। किसी बात को स्पष्ट कहना और सामने वाले को अपमानित कर देना एक काम नहीं है। यदि सुधार का उद्देश्य निर्माण है, तो उसके स्वर में भी उस उद्देश्य की पहचान होनी चाहिए। मुझे यहाँ अपने ज्ञान से अधिक अपने व्यवहार को देखना पड़ता है। जो बात मैं ठीक समझता हूँ, उसे किस ढंग से रखता हूँ? क्या मेरी स्पष्टता दूसरे को समझने की जगह देती है, या केवल अपनी शक्ति का अनुभव कराती है?

कोमलता का एक पक्ष दूसरे की सीमाओं को देखना है। हर व्यक्ति अपनी परिस्थिति और कठिनाइयों के साथ उपस्थित होता है। यह विचार गलती को ठीक मान लेने के लिए नहीं है। वह निर्णय देने के पहले परिस्थिति समझने की जगह बनाता है। जिस काम के लिए समय या सहायता चाहिए थी, वहाँ केवल तिरस्कार से क्या स्पष्ट होगा? यदि जिम्मेदारी निभाने में कमी रही है, तो उसे उचित रूप से कहना जरूरी हो सकता है। साथ ही सुधार का अगला कदम भी सामने रखा जा सके। व्यक्ति को केवल उसके दोष के सामने अकेला छोड़ देना निर्माण का पूरा अर्थ नहीं है।

दया और मार्दव इस दृष्टि में केवल मन के कोमल भाव नहीं रहते। वे व्यवहार को आकार देते हैं। किसी की बात पूरी सुनना, भूल की चर्चा को उचित सीमा में रखना और सुधार के समय उसकी गरिमा बचाना उन्हीं भावों के रूप हो सकते हैं। मैं इन्हें किसी बड़े अवसर की प्रतीक्षा में नहीं रखना चाहता। साधारण साझा काम में भी उनकी जरूरत सामने आ जाती है। किसी ने अभी सीखना शुरू किया है, तो उसकी अनभिज्ञता को मनोरंजन का विषय बना देना आसान हो सकता है। वही जगह सहयोग का अवसर भी बन सकती है, यदि हम अपनी दृष्टि बदल सकें।

दृढ़ होने के लिए कठोर दिखाई देने की आवश्यकता को भी मैं इसी स्थान पर जाँचता हूँ। किसी नियम को स्पष्ट रखना संभव है और साथ ही भाषा में कटुता न लाना भी संभव है। अपने उचित मत पर टिकना और दूसरे के पूरे व्यक्तित्व को खारिज कर देना अलग बातें हैं। पुस्तक का मार्दव हमें इन हिस्सों को साथ समझने देता है। मनुष्य के पास शक्ति हो तो उसका प्रयोग किस दिशा में होता है, यह उसके चरित्र का प्रश्न है। ज्ञान और अनुभव बढ़ने पर विनम्रता के लिए जगह भी बढ़े, ऐसा आग्रह इस गुण के भीतर बना रहता है।

भीतर की मर्यादा

ह्रीः को मैंने मर्यादा-बोध कहा है। यह केवल झिझकने या सार्वजनिक रूप से शर्माने की स्थिति नहीं है। वह भीतर की ऐसी जागरूकता है जो अनुचित दिशा में कदम बढ़ाने के पहले हमें रोक सकती है। जब कोई देखने वाला न हो, तब भी अपने आचरण के विषय में प्रश्न उठे। किसी अनुपस्थित व्यक्ति को छोटा बनाने की बातचीत में यह प्रश्न बहुत सीधा हो सकता है। मैं इस वाक्य के साथ अपने चरित्र की कौन सी दिशा स्वीकार कर रहा हूँ? बाहरी प्रशंसा मिल जाने से हर बात भीतर भी उचित नहीं हो जाती।

कभी दूसरे को चोट पहुँचाने वाली भाषा पर समूह की हँसी मिल सकती है। उस क्षण अपने भीतर के संकोच को केवल कमजोरी मानकर दबा देना ठीक नहीं लगता। पुस्तक की दृष्टि में मर्यादा हमारा आत्मसम्मान सँभालती है। हमें हर उपलब्ध अवसर का लाभ उठाना जरूरी नहीं। कोई बात अपने पक्ष में उपयोग की जा सकती है, फिर भी उसे न कहना अधिक उचित हो सकता है। यह निर्णय बाहर से छोटी बात दिखाई देगा। भीतर वह हमारी सीमा तय करता है कि प्रशंसा या लाभ पाने के लिए हम किस प्रकार की भाषा स्वीकार नहीं करेंगे।

इसके साथ अचापलम् का विचार जुड़ता है। उसमें सोच-समझकर आचरण करने की स्थिरता है। जो बात अभी सुनाई दी, उसे तुरंत आगे बढ़ा देना ही हमारी एकमात्र संभावना नहीं। हम रुककर देख सकते हैं कि उसके बारे में वास्तव में कितना जानते हैं। क्या प्रतिक्रिया अभी आवश्यक है? क्या हमारी भावनाएँ विवरण को बदल रही हैं? यह ठहराव अपने विवेक को काम करने की जगह देता है। मन में कोई भाव उठना और उसी क्षण उसे पूरा आचरण बना देना एक बात नहीं है। स्थिरता इन दोनों के बीच जिम्मेदारी की जगह खोल सकती है।

चरित्र ऐसी ही छोटी जगहों पर बनता हुआ दिखाई देता है। कोई एक बड़ा वाक्य कह देने से हमारी सारी भाषा बदल नहीं जाती। बार-बार अपने कथन का उद्देश्य देखना, अधूरी बात आगे न बढ़ाना और उचित सुधार के लिए शांत संवाद रखना अभ्यास माँगते हैं। कभी अपनी ही पुरानी आदत सामने आ जाएगी। उस क्षण दूसरे पर नियम लागू करने के स्थान पर अपने हिस्से की जिम्मेदारी लेना उपयोगी होगा। दैवी गुणों का विचार मुझे इसी नियमितता की ओर लाता है। वे अपने को उत्तम घोषित करने के नाम नहीं, अपने व्यवहार को अधिक सजग बनाने के अवसर हैं।

अपना समय निर्माण को दें

युवा पाठकों के लिए इस विचार की एक बहुत सरल दिशा है। जिस समय को हम दूसरों की कमियाँ जोड़ने में लगा सकते हैं, उसी समय में अपने अधूरे अध्ययन या काम का एक हिस्सा भी पूरा हो सकता है। यह कोई कठोर उपदेश नहीं, अपने अवसर को देखने का प्रश्न है। मित्रों के साथ बैठना, हँसना और विश्राम करना जीवन का हिस्सा है। उसके लिए किसी अनुपस्थित व्यक्ति को बातचीत का बोझ उठाना जरूरी नहीं। साझा रुचि, किसी सीखी हुई बात या किसी उपयोगी काम की चर्चा भी संबंधों को अपना समय दे सकती है।

अपने सीखने की ओर लौटने से दूसरे की सफलता को देखने का ढंग भी बदल सकता है। यदि कोई साथी आगे बढ़ा है, तो उसके काम से क्या समझा जा सकता है? उसके प्रयास का मान रखकर अपना अगला कदम देखना संभव है। उसकी उपलब्धि को छोटा करने के लिए कोई कमी खोज लेना क्षणिक संतोष दे सकता है, पर हमारे अपने अध्ययन का स्थान नहीं लेता। पुस्तक में अपैशुनम् का संबंध स्वयं को सुधारने से भी रखा गया है। अपने काम में लगना उस विचार की साधारण, पर अर्थपूर्ण दिशा हो सकती है।

किसी को छोटा किए बिना जीने का अर्थ यह नहीं कि हमें कोई कमी कभी दिखाई न दे। वह अपनी दृष्टि और भाषा के उद्देश्य को अधिक जिम्मेदार रखना है। उचित बात उचित स्थान पर कही जाए, समाधान की संभावना बनी रहे और मनुष्य की गरिमा को अनावश्यक क्षति न पहुँचे। इन तीनों के बीच संतुलन खोजने का काम हर स्थिति में नया होगा। अपने लिए इतना अवकाश रखें कि तत्काल प्रतिक्रिया ही हमारा पूरा उत्तर न बन जाए। कभी थोड़ा ठहरकर कही हुई स्पष्ट बात अधिक सच्ची सहायता दे सकती है।

सोलहवें भाग का यह छोटा सा गुण अंततः मेरे सामने अपनी ही भाषा का दर्पण रखता है। सामने मुस्कान और पीछे तिरस्कार के बीच जो दूरी है, उसे अपने भीतर देखना पड़ता है। अपैशुनम्, मार्दव, मर्यादा और स्थिरता उस दूरी को समझने के अलग रास्ते खोलते हैं। जहाँ सुधार चाहिए वहाँ काम करूँ, जहाँ पूरा ज्ञान नहीं वहाँ सावधानी रखूँ, और जहाँ दूसरे का मान मेरे शब्दों पर निर्भर है वहाँ उदार रहूँ। इतना अभ्यास बना रहे तो संबंध केवल साथ बैठे लोगों तक सीमित नहीं रहेंगे। उनमें अनुपस्थित व्यक्ति के लिए भी सम्मान की जगह बची रहेगी।

संदर्भ: श्रीमद्भगवद्गीता — स्वयं को पहचानो
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